कोरोनाकाल में चिंता का विषय बनी भारतीय शिक्षा व्यवस्था



आज जिस तरह नई शिक्षा नीति और ऑनलाइन शिक्षा की बात की जा रही है, उसका इससे कोई संबंध नहीं है. उसका संबंध शिक्षा के निजीकरण के मॉडल से है, जिसकी जड़ में बिड़ला-अंबानी कमेटी की रिपोर्ट है।ऐसे  में उसकी ऐतिहासिकता में जाने बिना इसे समझना संभव नहीं।

वैसे यह तथ्य भी बहुत मजेदार है कि शिक्षाविदों के द्वारा शिक्षा नीति बनाने की परंपरा जो राधाकृष्णन से चली आ रही थी, उसे खत्मकर बिड़ला-अंबानी जैसे पूंजीपतियों के नेतृत्व में शिक्षा नीति तैयार करने का निर्णय अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के द्वारा किया गया।

सरकारी संस्था है ज्यादा परेशान:

पटना के एक सरकारी  इंटर कॉलेज  के प्रिंसिपल कहते हैं, “प्राइवेट स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज शुरू हो गई हैं। वहां व्यवस्था बेहतर है, शिक्षकों और बच्चों के पास भी सुविधाएं हैं लेकिन सरकारी स्कूलों का स्तर अलग है। हमारे अधिकतर शिक्षक तो पहले से ही हड़ताल पर हैं कब लौटेंगे, पता नहीं। अधिकांश बच्चों के पास भी स्मार्टफोन की सुविधा नहीं है, ऊपर से कंप्यूटर के शिक्षक स्कूलों में न के बराबर ही मान के चलिए। स्कूलों में ही कंप्यूटर की ठीक व्यवस्था नहीं हैं, घर की तो बात ही छोड़ दीजिए। ऐसी स्थिति में ई-क्लासेस जैसे प्रयोग यहां सफल कैसे हो सकते हैं।”

उत्तर प्रदेश के बलिया में एक सरकारी स्कूल की प्रधान अध्यापिका ऊषा सिंह बताती हैं, “हम भले डीजिटल इंडिया होना का दावा कर लें, लेकिन आज भी हकीकत यही है कि ग्रामीण इलाक़ों में प्रति सौ लोगों पर केवल 21.76 व्यक्ति के पास ही इंटरनेट है। जिनके पास ये सुविधा है भी, वो लोग भी उसका इसतेमाल ठीक से करना जानते हों ये कहा नहीं जा सकता। ऐसे में हम ई-क्लास की व्यवस्था कैसे कर सकते हैं।”

क्या है भारत सरकार की रणनीति?

20 मार्च को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारी अमित खरे ने प्रमुख सचिव को चिट्ठी लिखकर डिजिटल लर्निंग को प्रोत्साहन देने की बात कही। उन्होंने मंत्रालय की ओर से ऑनलाइन एजुकेशन के लिए मुहैया कराए जाने वाले प्रमुख ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म की जानकारी भी दी।

इसके बाद सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के कई स्कूलों ने ऑनलाइन लर्निंग मोड से अगले अकादमिक (2020-2021) सत्र की पढ़ाई भी शुरू कर दी। 15 अप्रैल को सीबीएसई और फिट इंडिया मिशन ने मिलकर छात्रों को न्यूट्रीशियन, योगा और बेसिक एक्सरसाइज के बारे में जानकारी के लिए ऑनलाइन क्लासेज़ की शुरुआत भी की। कुछ राज्य सरकारें भी अपने यहां ऑनलाइन क्लासेस की व्यवस्था में लगी हुई हैं।

कुछ क्षेत्रों में वरदान साबित हो रही है ऑनलाइन शिक्षा:

लॉकडाउन की मजबूरी में शुरू की गई ऑनलाइन शिक्षा विद्यार्थियों के लिए वरदान साबित हो रही है। एक तरह से ऑनलाइन शिक्षा के लिए यह अभूतपूर्व घड़ी है। किसी भी विवि का छात्र दूसरे विवि की वेबसाइट पर अपलोड स्ट्डी मैटेरियल को बेरोकटोक अध्ययन कर सकता है। इससे मेधावी छात्र-छात्राओं के हौसले को उड़ान भरने की उम्मीद जगी है। विद्यार्थी अपने ज्ञान पिपासा को शांत कर सकते हैं। अपने विषयों की जानकारी को समृद्ध कर सकते हैं। वैसे भी शिक्षाविद् अब सिलेबस के बड़े हिस्से को ऑनलाइन पढ़ाने का मन बना चुके हैं। दरअसल लॉकडाउन के बदले हालात में शैक्षणिक संस्थानों ने रणनीति बदली है, जो आने वाले दिनों में तुरूप का पता साबित हो सकता है। क्योंकि इसके द्वारा शारीरिक दूरी को आक्रामक रूस से प्रोत्साहित किया गया। वैसे निजी संस्थानों में प्रारंभिक से लेकर उच्चतर तक ऑनलाइन कक्षाएं पहले से ही शुरू हैं। विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रहे, इसलिए प्रारंभिक से उच्चतर तक ऑनलाइन स्टडी अपलोड करने की योजना बनी और इसे अपनाया भी गया। वैसे प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा की कमान दूरदर्शन ने बखूबी थाम रखी है। वहीं विश्वविद्यालय में शैक्षणिक सत्रों को नियमित करने की जिम्मेवारी यूजीसी ने संभाली है। उसने विवि को शैक्षणिक सत्रों को नियमित करने के लिए ऑनलाइन इग्जाम और प्रोमोटेट का विकल्प सुलझाया। खास बात यह है कि वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय जैसे संस्थान, जहां के 80 फीसद विद्यार्थी सुदूर गांवों के नामांकित है। जिनके माता-पिता प्रवासी कामगार अथवा छोटे किसान-मजदूर हैं। वे अपने बच्चे की पढ़ाई की ट्यूशन फीस बमुश्किल पूरा करते हैं। लॉकडाउन में शुरू हुई ऑनलाइन पढ़ाई तक उनकी पहुंच नहीं हो पा रही है। क्योंकि उनके पास स्मार्ट मोबाइल नहीं है। प्राथमिक से लेकर उच्चतर शैक्षणिक संस्थान के शिक्षकों को अल्पकालिक प्रशिक्षण देने की योजना पर गंभीरता से मंथन चल रहा है।


ब्लॉगर शुभम पांडेय


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